प्रेम की रश्मि

*कविता*प्रेम की रश्मि

प्रेम की सागर में जो डूब गया 
ज़िंदगी साँसो में वह चूब गया
मोहब्बत को झुका देती है मजबूरियाँ
पलको का नयन बदल देती हैं नजरियाँ

प्रेम की लगाव में हम भी डूबे थे
वक्त की रफ़्तार में हम भी हारे थे
किसी के आधार हम भी जीये थे
वक्त के आईने में हम भी आये थे

खोये-खोये से हम भी जीते थे
तिमिर की छाया में भी रहते थे
स्नेह की राते में हम भी बरसते थे
गगन की हवाओं हम भी झूमते थे

प्रेम की रस हमें ना मिल पाया
नयनों का पलकें हमने घुमाया
चाह की नजरिया हमने बनाया
खुद को प्रेम की सागर में सूखाया

ज़िंदगी की राग मुझसे दूर जाती हैं
प्रेम की संसार मुझसे टूट जाती हैं
सूर्य की रश्मि मुझसे रूठ जाती है
मेरी चाहत ही मुझसे दूर जाती है

रचयिता:रामअवध










0 Comments