थम-थम के

*कविता*थम-थम के

थम-थक के चलेगें झरा
धम-धम के बसेगें झरा
ये नभ यूँ ही रह जायेगा
वे वक्त यूँ ही ढल जायेगा

जिंदगी अब दूरियाँ माँगती है
यादें ओर करीब आ आती है
वक्त ओर कही चली जाती है
ना आने का पैगाम दे जाती है

ये सफ़र की राह भी बोलती है
राहों में मेरी बात भी जोड़ती है
चलता-चला जा रहा है ये वक्त
यूँ ही ढलता जा रहा है ये रक्त

अब वक्त लौट कर ना आयेगा
जिंदगी ही सब कुछ कह जायेगा
खुब सहे थे,जिंदगी की मार से
खुब रहे थे,समय की हार से

रचयिता:रामअवध



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