छाप की गटक

*कविता*छाप की गटक

मैं कहता हूँ मुझे अकेला छोड़ दो
पथ की नगर मुझे अकेला मोड़ दो
मेरी छाप मेरी पलकों में रह जाती है
ज़िंदगी मेरी अरकों में ठहर जाती है

मेरे कदम अकेले चल रहे थे
साथ ना होने का गम खो रहे थे
खुद की पैरों की गुनगुनाहट थी
मेरी ढाँचा में ऐसी ही बनावट थी

सूरज की किरणें से तप रही थी
स्वेद की बूँदे मुझे गटक रही थी
परछाई की छाँव भू को लपट रही थी
देह की चाहत अब बेहाल हो रही थी

मेरी परछाई मुझसें ही कुछ कहती है
उजालें की तलाश में वह भी भटकती है
सोये हुए ख्वाहिश को वह भी जागाती है
कौन? कैसा है वह भी मुझे बताती है

उजाले के दर्पण में दिखता हूँ
कही दूर जाकर ही छिपता हूँ
क्या?प्यास लगी है ज़िंदगी की
ख्वाहिश देखी है अपनों की

रचयिता:रामअवध


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