ढल जा

*कविता*ढल जा

ढल कर भी सूरज उग जाता है
मर कर भी यादें जी जाता है
जीने की राग यूँ ही चलता-रहता है
साँसे हमारी यूँ ही धड़कता-रहता है

वनों की कतार भी बोलती है
खग की उतार भी डोलती है
वक्त का दर्पण भी दिखाता है
तर्पण का अर्पण भी सीखाता है

अडिग पर ये जान बसेगा नही
हास के पल ये भ्रम रहेगा नही
कदम की राह में काँटे ढूँढूगा नही
चल रहे है कदम कही रोकूँगा नही
यादों की नगर में कही टोकूँगा नही

जिंदगी साँस कभी तो टूटेगा
जीने की डगर कभी तो मिटेगा
चेतन की गगर कभी तो रूसेगा
वक्त का पन्ना अभी तो पलेगा

ये राहों की डोर कभी तो मिटेगा
जिंदगी का सवेरा कभी तो मुड़ेगा
नया चेतना,नया उमंग तो आयेगा
ये सवेरा,ये जग कहाँ ?मिल पायेगा

रचयिता:रामअवध


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