जिंदगी दूर है

*कविता*जिंदगी दूर है

ये राहों की डोर हर बार टूटी है
जिंदगी के पन्ने हर बार पलटी है
पलटी दीवारों हर बार लिखती है
जाने कहाँ?जीने की राज़ खुलती है

धीरे-धीरे कदम बढ़ना पड़ेगा
वक्त की मार से लड़ना पड़ेगा
यादों को हमे सहना पड़ेगा
वक्त के साथ रहना पड़ेगा

कही दूर हमें जाना पड़ेगा
बीते पल को आना पड़ेगा
जिंदगी को बताना पड़ेगा
खुद के वक्त में खोना पड़ेगा

कही दूर से लहर आयेगा
खुशियों की डगर आयेगा
खुब रहेगें,वक्त की नगर में
कहाँ?ढलेगें,रक्त की कहर में

छिपते नभ भी कुछ कह जाता है
जिंदगी की यादों में रह जाता है
चलते बादल बूँदों का संकेत देता है
जिंदगी के पल यादों को लपेट देता है

रचयिता:रामअवध

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