कही ना कही

*कविता*कही ना कही 

कही ना कही हम रह जायेगें
सफ़र दूर है हम बस जायेगें
कहाँ?तक यादें लिखी जाती है
जीने के आगे बात बीती जाती है

हम भी चाहत की चरम में है
नम भी राहत की नमन् में है
लौटा ना पायेगें,हम किसी जान को
क्या? पा लेगें,हम किसी शान को

ज़िंदगी की छवि बनकर आयेगी
ना जाने कब?रवि बनकर जायेगी
लहरता श्रावन लहरा कर आयेगा
जाने कब?ज़िंदगी बहार में आयेगा

वक्त का गगन अब ठहर ही जायेगा
सागर की लहर अब घट ही जायेगा
दर्पण की छवि में चाँद देखा मैंने
लहरते हुए में बादल आग देखा मैंने

मेघों की धारा बदल ही जाती है
जीने की काया लहर ही जाती है
वनों की कतार उतर ही जाती है
मरे वक्त की उड़ान मर ही जाती है

रचयिता:रामअवध






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