वक्त की छवि

*कविता*वक्त की छवि

रंगों की ओढ़नी छायी है
खुशियों के बहार लायी है
जीने का इक़रार पायी है
वक्त मेरा अब लेकर आयी है

कह जायेगा,ये ज़माना मुझसे
वक्त ना आयेगा,लाना मुझसे
जीने की रैन यूँ ही ढल जाती है
हास की चाह यूँ ही गुज़र जाती है

उजाला भी वीराना लगता है
ज़िंदगी भी ठहराना लगता है
वक्त की डोर भी अजान लगता है
भाग्य की मोड़ भी बेकरार लगता है
ज़िंदगी की दौड़ भी इकरार लगता है

तिमिर की छवि बनकर आयेगी
जीने की डोर हमारी टूट जायेगी
वक्त की राख हमारी उड़ जायेगी
ज़िंदगी की बात हमारी खुल जायेगी

खुशियों का पल अब आने दो
चरम की हास अब डहराने दो
दर्पण की दौड़ अब दिखाने दो
ज़िंदगी की चाह अब आने दो

रचयिता:रामअवध

0 Comments