डैना की गगन

*कविता*डैना की गगन

सूर्य की लालिमा खो रही है
परिंदो की हालिया सो रही है
गगन के साथ लहर रही है
पंख फैला कर जी रही है

बीहड़ के तन में रह रही हैं
कुदरत में कुल जी रही है
धरा पर कदम रख रही है
उड़ने की डैना रोक रही है

धरा पर आना-जाना करती है
पंख फैला कर रंग बदलती है
शोभन सा मुखड़ा दिखाती है
आकाश के दौर में लहराती हैं

चाँद की अमन मुझे दिखाती है
आकाश की पथ पर सहलाती है
धीरे-धीरे से डैना मुझे महकाती है
परिंदों की ज़िंदगी मुझे भाँति है

देखता हूँ,परिंदों की चाहत को
रखता हूँ,ज़िंदगी की राहत को
धीरे-धीरे जीने का पथ ढल जायेगा
वक्त है,परिंदों का रथ चढ़ जायेगा

रचयिता:रामअवध









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