तन-मन टूट

*कविता*तन-मन टूट 

तन-मन टूट
यादों को लूट

ये जीने की माया ही तो है
रातों की ज़िंदगी उड़ाती है
ये वक्त की छाया ही तो है
जो राहों की नगर बनाती है

कहाँ? बीतेगी हमारी बातें
कहाँ? दिखेगी हमारी रातें
समय का गुण हम भी रखेगें
वक्त आने पर हम भी दिखायेगें

टूटी है ज़िंदगी पर दुखी नही है
लिखी है भाव पर दिखी नही है
कहने को ये ज़िंदगी है
पर साँस हमें लिखनी है

जीने की साँसे कहाँ?दौड़ती है
तन-मन हमारा कहाँ? ढोलती है
जीने की छवि भी कही दिखती है
उगते हुए ये रवि भी कही खिलती है

कही की यादें कही चली जाती हैं
ज़माने की वक्त मुझे ही बुलाती है
कब?तक छिपेगी की यादे मुझसे
कभी तो दोहरायेगी बातें मुझसे

रचयिता:रामअवध

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