रश्मि भूमंडल पर

*कविता*रश्मि भूमंडल पर

दिनकर की दर्पण आ रही है
नीर पर लालिमा दिखा रही है
सौंदर्य की मूर्ति बनी है नीर पर
पल भर में आ जाती है,चीर कर

रश्मि ही भूमंडल को जागाती है
वही तो सवेरा बनकर महकाती है
छिप जाने पर तिमिर ही लहराती है
आ जाने पर ज़िंदगी को सहलाती है

कुदरत की माहिर यही तो बनाती है
परिंदों की आवाज़ यही तो सुनाती है
दूर रहकर भी अपनी चमक दिखाती है
तप कर भी रश्मि को भू पर भेजती है

बूंदों पर भी लालिमा दिखती है
दूबों पर भी बूँदे अब ठहरती है
खिली कुदरत अब सहगामी है
श्रावण की लहर अब बरसाती है

श्रावण का झोंका आ रही है
सूरज की चमक ढल रही है
दिनकर आज बढ़ रही है
सूर्य की लालिमा ढल रही है

रचयिता:रामअवध



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