खौफ की रूह

*कविता*खौफ की रूह

दौड़ने लगे है,पल की तन्हाई में
रूकने लगे है,छल की शहनाई में
लगे थे,मोह की पुकार सुनने में
आये थे,लगाव की तन बाँधने में
रह जाथे थे,ज़िंदगी का अंग लगाने में

खड़े थे,ज़िंदगी की राहों में
पड़े थे,जिस्मानी की देहों में
आये गये थे साँस की रूहों में
बस गये थे,ज़िंदगी की बातों में

खौफ की रूह मुझे डहलाती है
मनुज की बात मुझे सताती है
लगाव की रात अब हटाती है
मुँह से आवाज़ ना निकलती है

ज़िंदगी भी कदम को बाँधती है
मजबूरियाँ भी नर को झुकाती है
चाहत भी नयनों पर बस जाती हैं
लिखी बातें भी अब मिट जाती हैं

दूर की राह हम कही देखेगें
भूल कर हम कही बसेगें
यादों में हम कही रह जायेंगे
जीने की राह में कही ढल जायेंगे

रचयिता:रामअवध






0 Comments