कण-कण में रूह

*कविता*कण-कण में रूह

कण-कण तेरा रूह बन जाऊँगा
जाड़ा में तेरी चादर बन जाऊँगा
ख्वाबों तेरी तिमिर ढल जायेगी
मेरा पल तेरे ख्वाब रह जायेगी

माटी ही मुझसे कुछ कहता होगा
बैठे-बैठे मेरी ही राग सुनाता होगा
दूर रहकर भी तेरी यादें में बसता हूँ
ख्वाबों की सादर तेरी वादे में रखता हूँ

तेरी मुखड़े की ढाँचा छिपती है मुझसे
दूर जाने पर क्यों? मिलती है मुझसे
आप आने पर दूरियाँ बढ़ती है तुझसे
नजरियों पल से क्यों?छिपती हो मुझसे

तेरे पल से पल जो जुडता है
वही तो यादों हमें मिलता है
तेरी हँसी मेरी जान बसती है
तेरी ख्वाब मेरी नयन पर बसती है

रचयिता:रामअवध

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