तरण-वरण

*कविता*तरण-वरण

तरण लेकर चलते है नीर के बहाव में
चरण लेकर चलते है वीर के लगाव में

हाथ बाँधने है हाथों की लकीर में
जीये है ज़िंदगी-ज़िंदगी की तकदीर में
आये है संकेत-संकेत की तकरार में
पाये है संवेदन-संवाद की बेकार में

ये कदम नौका की चाल बनना चाहती है
सागर में डूबते हुए पार करना चाहती है
पल को ढूँढते हुए मेरी इक़रार माँगती है
ज़िंदगी की साँस मेरी एक बार माँगती है

दूर-दूर तक नीरों की बहाव में चल रहे है हम
चल-चल कर वक्त के लगाव में आ रहे है हम
वक्त मेरा ज़िंदगी के ढलाव में बढी़ जा रही है
अनुराग की छाया ज़िंदगी से टूटी जा रही है

ना जाने कौन?सी ज़िंदगी में चली जा रही है
वक्त की छाया मेरी ज़िंदगी में बढी़ आ रही है
पाया है ज़िंदगी का इन्तजार अब ढल चुकी है
आया है ज़िंदगी का तासीर अब बदल चुकी है

निर्मल दिखती है मेरी ज़िंदगी की अंश
कब? खिलती है मेरी ज़िंदगी की वंश
सोचता हूँ,ज़िंदगी की तकदीर में
आता हूँ,मुलाक़ात की इकरार में

रचयिता:रामअवध











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