तम

*कविता*तम

रात की छाया सुहानी होती है
बात की माया रुहानी होती है
तम में छिपता घन भी प्यारा लगता है
तिमिर की काया में वक्त आधा लगता है

रूह भी मुझे तड़पाती है
काल भी मुझे सताती है
राह भी मुझे बताती है
डाह कर मुझे जाती है

अग्नि की राख अब उड़ने दो
वक्त की काया अब ढूँढने दो
निहार की हेमंत अब बढ़ने  दो
जग की माया से दूर अब रहने दो

बीते वादे भी छिपने लगी
इरादे भी अब घटने लगी
ज़िंदगी भी अब रूसने लगी
चाहत भी अब मिटने लगी

जीने का पल अब घटने लगी
वक्त का काल अब आने लगी
ज़िंदगी की पथ अब छिपने लगी
यादे का पल मेरी अब दिखने लगी

रचयिता:रामअवध




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