जीने के फूल

*कविता*जीने के फूल 

कोई तो है जो मुझे समझ जाये
आये खुशियों के साथ लहर जाये
ज़माना हँसता हुआ निकल जाये
भागता हुआ ज़िंदगी आगे बढ़ जाये

वक्त यूँ ही घटता चला जायेगा
दिन यूँ ही बढ़ता चला आयेगा
साँस यूँ ही डूबता चला जायेगा
वय यूँ ही घटता चला जायेगा

कदम भी ठहरने लगेंगे
कलम भी टहलने लगेंगे
बीते पल दोहराने लगेंगे
नयन भी मुरझाने लगेंगे

जीने के फूल अब खिलते नही
ज़िंदगी के इरादे अब रहते नही
कब? ढल जाती है रात की परछाई
आते है मेरे पास ज़िंदगी की लड़ाई

रचयिता:रामअवध




0 Comments