तम की खौफ़

*कविता*तम की खौफ़

लोभ नही रहा इस मन में
खौफ़ नही बचा इस तन में
तम की चादर में हम सो जाते है
डर की कादर में हम छिप जाते है

थम जाता हूँ वक्त के अँधेरे में
शम आता हूँ निसर्ग के सीने में
खोये रहे थे अनुराग की तड़प में
सोये रहे थे ख्वाहिश की तरफ में

चलते कदम में धूल चिपकती है
राहों की रूह में फूल चमकती है
तब?जाकर खुशियाँ भी लहराती है
तभी तो वक्त की गहराई दिखती है

निसर्ग भी ज़िंदगी को सुधारती
मनुज की काया भी सहलाती है
संसार का नगर भी ठहराती है
बीहड़ की काया भी बनाती है

जीने की साँसे भी लहराती है
बुद्धि की गहराई भी दिखाती है
मोक्ष की पथ हमें भी दिखाती है
रब की दुआ हमें भी सजाती है

रचयिता:रामअवध




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