छल-छल

*कविता*छल-छल

छल-छल थी,ज़िंदगी के दर्पण
खिल जाते थे सीने का अर्पण
छिपती रहती थी यादों की रेखा
जलते-देखा था वादों का राख

खिलते फूल अब गिरने लगती है
सौंदर्य तिमिर अब ढलने लगती है
राहों की नजर अब बदलने लगती है
ज़िंदगी की पल अब रुकने लगती है

वक्त में रुकने आदत नही होती
राहों में टूटने की वादत नही होती
चलते क़दमें में राहत नही होती
यादों के आलम में चाहत नही होती

थम जाती है ज़िंदगी का तिमिर
आकर रह जाती है मन का वीर
छिपती रहती है यादों की डगर में
आती है ज़िंदगी यारों की नगर में

ज़िंदगी भी अब जहर उगलती है
चिपकती यादें भी कहर देती है
वक्त टूट जाने पर,राह बदलती है
राहों में बवंडर की राख उड़ती है

रचयिता:रामअवध




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