परछाई

*कविता*परछाई

पीछे-पीछे वह चलती थी
अँधेरे में वह ही छिपती थी
साथ ना मेरा छोड़ती थी
उजाले में वह दिखती थी

नयी ढाँचा वह बनती थी
धरती पर वह दिखती थी
आकर मुझसे मिलती थी
मेरा दर्पण मुझे दिखती थी

साथ ये कदम रखती है
जीवन भर वह चलती है
कभी ना पीछा छोड़ती है
तम की काया वह छिपती है
परछाई ही तो मुझे दिखती है

अंगो-अंगो की ढाँचा रही है ये
तन-मन की ये दर्पण बनी है ये
क्षण-क्षण भर साथ निभाती हो
तन-मन के भीतर ही रहती हो

रचयिता:रामअवध

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