कण-कण में पोर

*कविता*कण-कण में पोर

मुझे राहों की डोर बनाती है
कण-कण में पोर बाँन्धती है
ज़िंदगी के संग मुझे सताती है
टूट जाने पर आँसू ये बहाती है

कदम की परछाई भी चलती है
जीने की हरजाई भी मचलती है
ये जीने की राह कब?बदलती है
ये ख्वाबों की नींद कब?ढलती है

चल-चल ये कदम थक चुकी है
बार-बार ये कलम ठक चुकी है
यादें की राह कही बस चुकी है
खुशियों का वक्त कही ढल चुकी है

भौंर की किरण मुझे उठाती है
तम की छाया मुझे सुलाती है
चाँद की सौंदर्य मुझे भाँति है
विपत्ति की पुकार मुझे रुलाती है

चुप बैठे थे,वक्त की याद में
छुप गये थे,नक्त की ताज में
रह गये थे ,जीने की राज़ में
थम गये थे,पाने की बात में

रचयिता:रामअवध

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