आ गयी थी

*कविता*आ गयी थी

कदम की छाप बन रही थी
सूरज की ताप बढ़ रही थी
राह पर कदम बढ़ रही थी
ज़िंदगी की पथ ढल रही थी

मौसम की चादर ढल गयी थी
रंगो की बरसात आ गयी थी
ज़िंदगी का मन-मान गयी थी
हारी साँसे भी जाग गयी थी

धूल की कण उड़ गयी थी
वक्त की रण बढ़ गयी थी
छाती की तन लड़ गयी थी
साँसे की डाह पड़ गयी थी

आँसू से भरी बूँदे गिर गयी थी
देखा ख़्वाब कब?टूट गयी थी
जीने की वक्त मेरी छूट गयी थी
ये डगर मेरी कब?रूस गयी थी

भाग रहे है,डगर की नगर में
आ रहे है,जीने की नजर में
जान रहे है,गगरा की नीर को
पा रहे है,जिंदगी की नूर को

रचयिता:रामअवध

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