डर-डर ना

*कविता*डर-डर ना

डर-डर हम ना रहेगें
कदम यूँ ही चलायेगें
विपत्ति को भागायेगें
खुशियों को बुलायेगें

ज़िंदगी को सुधारेगें
यादों में बस जायेंगे
वादों में आ जायेंगे
खुद को रोक पायेगें

ना ही बसेरा रहेगा मेरा
ना ही डगैरा बनेगा मेरा
ना ही सवेरा उठेगा मेरा
ना ही वाक्य रहेगा मेरा

ठम कर चल जीयेगें हम
सह कर रह जायेंगे हम
डर कर डट जायेंगे हम
मर कर जी जायेंगे हम

जीने का पल ढलती जायेगी
राह भी मेरी बदलती जायेगी
साँसे भी अब टूटती जायेगी
यादें भी कही बिखरती जायेगी

रचयिता:रामअवध



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