अधूरा-अधूरा

*कविता*अधूरा-अधूरा

चलती हवायें भी तरसती है
घन की कदमें भी दौड़ती है
अंगों का तन भी बोलती है
ज़िंदगी का रंग भी तोलती है

सूरज भी जलता होगा
तप कर भी उगता होगा
लाली अपनी दिखता होगा
ब्रह्मांड को जागाता होगा
प्राणी को पुकारता होगा

जुन्हाई भी पछताता होगा
चाहत अपनी बताता होगा
सौंदर्य अपनी दिखाता होगा
प्राणों को पुकारता होगा
विधाता को सकारता होगा

सागर भी प्यासा होता है
उदक भी गरजा होता है
ये बूँद भी तरसा होता है
ये वक्त भी तनहा होता है

अधूरा-अधूरा जगत भी है
ये धरती भी,ये गगन भी है
संगम चेतन को उठाती है
सागर में भी प्यास बुझाती है
समस्त को मुक्ति दिलाती है

रचयिता:रामअवध








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