कुछ खोते है

*कविता*कुछ खोते है

क्या जगत की माया है?
हँसी-खुशी उसने पाया है
धीरे-धीरे मनुज चलते है
ज़िंदगी में ही कुछ खोते है

मुखड़े भी मुरझाते है
वक्त ही अब जलाते है
डगर ही अब गिराते है
मुक़ाम ही अब सताते है

खुद का डगैरा बनाना पड़ेगा
खुद का नगैरा सजाना पड़ेगा
दूसरे की पथ पर बसेरा नही है
छल की रथ पर सवेरा नही है

राहों को ज़िंदगी से जोड़ दो तुम
वक्त को कभी ना मोड़ दो तुम
साहस को डगमगाने ना दो तुम
ज़िंदगी को जगमगाकर रख दो तुम

चलते थे हम भी सफ़र में
रह जाते थे हम भी नगर में
देखा था मैंने नर की छाया जली
पथ की नगर उसकी काया झली

रचयिता:रामअवध



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