खेतों की आरी में

*कविता*खेतों की आरी में

बैठे थे खेतों की आरी में
देखे थे नीरों की झारी में
कदम डोर हमें खिंचा लाती है
धान की चाह हमें बुला लाती है

दिखती है सूर्य की लाली नीर में
खिल जाती है वक्ष मेरे दिल में
परिंदो की उड़ान खेतों से भरती है
संध्या होते ही घर की ओर मुड़ती है

माटी का गुण भी हमें खिंचती है
धीरे-धीरे वक्त भी हमें रोकती है
गगन की उक्त भी हमें दिखती है
चाहत की रंग भी हमें लिखती है

नीर की बहाव दूर-दूर तक है
नयन की बाण दर-दर तक है
छिपती है ये वक्त मेरे पल में
दिखती है ये नक्त मेरे कल में

छिपे-छिपे हम भी रहते है
ना दिखने की चाह करते है
देखते ज़िंदगी कब सुधरती है?
वक्त की डोर कब मुड़ती है?

रचयिता:रामअवध















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