ज़िंदगी जलती है

*कविता*ज़िंदगी जलती है

ठहरती जा रही ज़िंदगी की कदम
लिखती जा रही है वक्त की कलम
पथ की डोर भी जलती जा रही है
सागर की लहर उठती आ रही है

ठहरते जा रहे जीने की साँसे भी
लहरते जा रहे है सपने की आँखे भी
सोचता रहता हूँ ज़िंदगी में सब्र रखूँगा
जगत के हिस्से में अपना कब्र रखूँगा

धीरे-धीरे ये हवा भी थमने लगेगी है
ज़िंदगी का राह भी घुमने लगेगी है
राहों की डोर भी अब टूटने लगी है
जिंदगी की रात अब उठने लगी है

वक़्त को रोकता जाऊँगा
खुद को मोड़ता आऊँगा
ज़िंदगी को छोड़ता जाऊँगा
खुद को जोड़ता जाऊँगा

रचयिता:रामअवध

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