राहों की दौर

*कविता*राहों की दौर 

वक्त की रफ्तार बढ़ती जा रही है
लोगों की ताज ढलती जा रही है
दूर-दूर रहना ये वक्त सीखाती है
तम की पथ में ये नक्त सीखाती है

सोचता हूँ ज़िंदगी की रूहों में
आ जाता हूँ अपने ही ख्यालों में
घट-घटकर वक्त की राह बदलती है
ज़िंदगी की आशा वही तो टूटती है

सपनों की ताज में,मैं भी कही खोया था
आ गयी वक्त में,मैं भी कही रोया था
कदम भी चलती है वक्त की वेदना में
खो जाती है ज़िंदगी किसी की वंदना में

लौटती है ज़िंदगी खुशियों की बहार में
तड़पती है ये रात ज़िंदगी की आकार में
कही ना कही मेरी भी वक्त से मुलाक़ात होगी
ज़माने की ताज में अपनी भी शौहरत होगी

बैठे रहेंगे राहों की दौर में
समझ जायेंगे वक्त की तौर
ढलते रहेंगे ये वक्त भी हमारा
आ जायेंगे जीने का नक्त भी हमारा

रचयिता:रामअवध











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