घर ही ना रहा

*कविता*घर ही ना रहा 

वह घर ही ना रहा
जो उजाले में थी
वह वक्त ही ना रहा
जो तलाशने में थी

घर दीवारें भी डहलाती है
आती साँसे भी लड़खड़ाती है
कोई तो पीछे बुलाती है
वक्त मेरी ही सताती है

कष्ट जलाती है सीने को
आती है जिंदगी जीने को
छोड़ेंगे ना उम्मीद डोर को
कह देगें ज़िंदगी की दौर को

तलाशते रहे,अँधेरे में उजाले को
पुकारते रहे,आशा की किरण को
समझ ना पाये हम,वक्त की राहों को
देख ना पाये हम,तिमिर की माया को

अंधड़ चलती है मेरी वक्ष में
ना दिखती है राह मेरी कक्ष में
सहते-रहते जिंदगी की दौर में
आता है ये साँस किसी नुर में

रचयिता:रामअवध










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