हेमंत की तम

*कविता*हेमंत की तम

मंजर के फूल खिलने लगी
उपवन की चमक आने लगी
तुहिन की बूँदे पड़ने लगी
तिमिर में रूह काँपने लगी

ओसों से भरी ये भू थी
बूँदों से गिरी ये नीर थी
नीर से भरी ये व्योम थी
सौभ्य से भरी ये चाँद थी
ना दिखने वाली ये वक्त थी

चलते है फसलों नीर में
काँपती ये तन-तन की रूह में
दिखती नही है उष्ण की चिंगारी
लगती है वक्षस्थल पर भारी

गीले-गीले में ये भूमंडल दिखता है
हेमंत की तम में ये चाँद चमकता है
अजब-ग़ज़ब की आहट की आवाजें
वक्षस्थल को छूती ये जग की दरवाज़े

रचयिता:रामअवध




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