आफ़त की रण

 

*कविता*आफ़त की रण 

आफ़त की रण हम भी हार चुके थे
जन के संकल में हम भी आ चुके थे
विवेक पर प्रहार हम भी सह चुके थे
षड्यंत्र की जाल हम भी फँस चुके थे

मेधा को निर्जन की ओर खो दिया
बेसुध को निर्मल की ओर घोल दिया
सरज़ोर की मुलाक़ात बढ़ती गयी
ज़िंदगी की तकदीरवर ठहरती गयी

जीने का भी एक रवैया होती है
संघनन की तरह साँसे होती है
जीने के लिए साँसे भरनी पड़ती है
वेदना के ज़िंदगी लड़नी पड़ती है

खोये-खोये से रवैया मेरे दिल में है
सोये-सोये से सवेरा मेरे दिन में है
भौंराना की चाहत में आज भी रखता हूँ
सौंदना की राहत में आज भी बोलता हूँ

ठहर जायेगी यादे मेरी
लहर आयेगी वादे मेरी
वक्त के हाथ मेरा साथ होगा
जीने की यादों मेरा रात होगा

रचयिता:रामअवध






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