कही पल कही छल

*कविता*कही पल कही छल

वक्त ढूँढता है तेरी राहों में आने लिए
ये कदम तड़पता है तेरी कदमों जाने लिए
नैनों की चाहत में तुझ पर भी दिखाऊँगा
वक्ष की कथा,मैं तुझ को ही तो बताऊँगा

तेरे कदमों की आहट आती है
शर्म से बैठे वक्त की राहत जाती है
मैं ज़िंदगी को दोहराता रहूँगा
तेरी यादों को पुकारता रहूँगा

अपने वक्त में लौटता हूँ
ज़िंदगी की बात बताता हूँ
ज़िंदगी ही सबको सताता है
वक्त ही सबको लौटाता है
 
वक्त की दौर मुझे ही सीखाती है
जीने का पथ मुझे ही दिखाती है
राहों की दौड़ में मुझे ही भागाती है
भागती जिंदगी मुझे सी सीखाती है

समझ कर बैठा हूँ इस राह को
जोड़ती है जिंदगी की तार को
आती है ये वक्त किसी पुकार में
जाती है ये वक्त किसी इंकार में

रचयिता:रामअवध









0 Comments