दूबों पर बूँद

*कविता*दूबों पर बूँद

दूबों पर ये कदम चलते है
सुकून भरी राह अब बनते है
कोमल से भरी इसके अंग थे
बूँदों से भरी इसके तन थे

नर बैठ जाते है मेरे तन पर
ज़िंदगी आ जाती है मेरे मन पर
सवेरा होते ही नरो की भीड़ लग जाते
खुशी-खुशी से मेरे पा आ जाते

हेमंत की बूँदों मेरे नाक रहती है
सूर्य की रश्मि मेरी चमक में रहती है
मैं जगहा-जगहा उग जाता हूँ
जिंदगी के पल ले आता हूँ

लोगों की भीड़ मेरे अंगों तोड़ जाती है
फिर भी चाहत उन्हीं पर रह जाती है
लोगों के कदम बड़े प्यार से चलती है
ज़िंदगी की पथ मेरी निसर्ग में ढलती है


मेरे पास रहकर कुछ कहते रहते है
जीवन की बातें कुछ छेड़ते रहते है
राहों की नजर कुछ बोलते रहते है
वक्त गहराइयों हम सोचते रहते है

ढलती वक्त भी बड़े प्यार से चलती है
जिंदगी की पथ मेरी निसर्ग पर पड़ती है

रचयिता:रामअवध



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