माहुर

*कविता*माहुर

माहुर की समीरा बन चुकी थी
मनुज की साँसों में घुस चुकी थी
कुछ जनों ने ही माहुर बनाया था
गगन में काला पयोधर लाया था

हट रही है,बीहड़ों की छाया
आ रही है,माहुरों की काया
अचला की रस भी मिट रही है
अम्बर की बूँदें भी छिप रही है

श्रावन भी लौट कर आता है
मौसम भी बदल कर जाता है
नाता तोड़ दिया कुदरत हमने
सृष्टि की देह को सता दिया हमने

भू के कण-कण को गर बना दिये
जीने की साँसों को दहन बना दिये
भागा दिये हमने परिंदों की डार को
लगा दिये हमने कुदरत की मार को

सृष्टि को कष्ट देकर कहाँ?जाओगें
नैनों से लहू बहा कर कहाँ?भोगोगें
कुदरत को हमने ही तो भागाया है
वेदना को हमने ही तो बुलाया है

रचयिता:रामअवध


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