काया की कष्ट

*कविता*काया की कष्ट

हम भी काया को कष्ट देने आये है
श्रम की छाया को मष्ट लेने आये है
भुजा की लकीरें भी बदल जाती है
पाहन की डगर भी बिखर जाती है

देह की बूँदे धारा बन कर निकलती है
अग्नि की ताप बन कर बह जाती है
कंठ नीर की मुलाकात माँगता है
देख जाने पर,उल्लास माँगता है

ये कदम भी इधर-उधर भागता है
मेहनत की पथ में यूँ ही चलता है
जिंदगी की मार ही यूँ ही भरता है
काया की बूँद यूँ ही लहरता है

देह भी दर्द से भर रहा था
वक्त भी कुछ कह रहा था
जन की भीड़ हम भी खोये थे
साँसो की तन हम भी सोये थे

वक्त को साथ में ढूँढता हूँ
बूँदों का रक्त भी बहता हूँ
जनों की बातें भी सुनता हूँ
खुद की साहस भी भरता हूँ

रचयिता:रामअवध

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