जंजाल

*कविता*जंजाल

जंजाल फैला दी इस जगत में
बुद्धि नष्ट कर दी इस आगत में
सोच इनकी है कीचड़ की द्वार में
दोच उनकी है जिंदगी की स्वर में

जलन होती है सीने के रक्त में
आ जाती है पसीने के वक्त में
नर की विवेक कही चली गयी
रोष की बुद्धि वही ठहर गयी

नर का नाता यूँ ही टूट जाता है
क्षण में ही रोष का नजर आता है
बातों-बातों में ये जंग हो जाते है
खुद को वीर कह दंग हो आते है

अपने-आप को ही सुधार लो
जीने की राह को पहचान लो
वक्त अपना कही जागा देना
सवेरा अपना कही बना लेना

अंधाधुंध की आवाजे चलती है
जिंदगी किसकी बाते सुनती है
इन हवाओ में माया सी घूमती है
रात की चाह में छाया सी ढलती है

रचयिता:रामअवध







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