नींदों की धुन

*कविता*नींदों की धुन

नींदों की धुन में रोया था
ना जाने कहाँ? सोया था
साँसो की जान में खोया था
धीरे-धीरे वक्ष में गोया था

बिखर गयी ख्वाबों की दुनिया
विकर गयी ख्वाहिश की देहिया
सब्र की वक्ष मेरी चाहत पर है
जीने की कोशिश राहत पर है

नींदों की पलक खुलती है नयनों में
याद आती है वक्त तेरी ख्वाबों में
सोया कर रहता है ज़िंदगी तेरी यादों में
रोया कर कहता हूँ बीते पल की वादों में

आयेगा पल अब आने दो
जायेगा कल अब जाने दो
नींद भी सब्र ही सीखाती है
ज़ोर की धुन ख़ौफ़ बताती है

कहाँ-कहाँ? हम रह जायेंगे
तेरी तन-मन हम बस आयेंगे
ढूँढता रहोगी की पथ की चाल में
आता रहूँगा,तेरे जीने की काल में

रचयिता:रामअवध




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