कही लग

*कविता*कही लग 

व्योम की समीर भी रुक चुकी है
चलता है कदम भी ठहर चुकी है
कहता है वक्त भी लहर गयी है
जीने की रफ्तार भी गहर गयी है

बीहड की छाया भी लहराती है
बैठे जनों की राहत दे जाती हैं
ख्वाबों की रफ्तार बढ़ जाती है
जीने की रफ्तार सज जाती हैं

वक्त मेरा कही लग जाती है
रंज की कहर मुझे दे जाती है
दर्पण की दर्शन दिख जाती हैं
पयोधर की रंग  बदल आती है

बैठी-बैठी ज़िंदगी भी रहती है
चलती-रहती वक्त बदलती है
जीने की साँस कही चलती है
बरसाती राह कही बदलती है

रचयिता:रामअवध



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