रियाज़ माँगता हूँ

*कविता*रियाज़ माँगता हूँ

बैठे थे,खेतों की नीर में
रहे थे,वक्त की फ़क़ीर में
आये थे,नक्त की शोहर में
पाये थे,उक्त की दोहर में

कुदरत से फ़रियाद माँगता हूँ
विधाता से रियाज़ माँगता हूँ
खोये रहते थे,माटी की धूल पर
सोये रहते थे,ख्वाब की भूल पर

आये थे, किसी के फ़रियाद में
ज़िंदगी ढल किसी के रियाज़ में
कहती है ज़िंदगी की वक्त मुझसे
आ कर रह जाती है,आज़माने से

पल भर की ज़िंदगी भी रुलाती है
भूमंडल की तर भी हमें सताती है
बैठे पल वह गगन भी बरसाती है
खेतों की जीवन भी याद आती हैं

सौंदर्य पल कही खो जाता हैं
ज़िंदगी अर्थ कही छिप जाता है
मुस्कान के चेहरे दिखते नही है
ज़िंदगी अब कही खिलती नही है

रचयिता:रामअवध


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