सृष्टि से उड़ा

*कविता*सृष्टि से उड़ा

सृष्टि से उड़ा धूल अब उड़ने लगी
ज़िंदगी का फूल अब खिलने लगी
छिपी रहती थी,ज़िंदगी की किरण
ढूँढता फिरता था,ज़िंदगी का तरण

आती रहती थी इक़रार का तोरण
कब?जाती थी तकरार का धोरण
वक्त के पसीने वक्त में ही सूखते है
मन की चाहत मन में ही टूटते है

सोच की गहराई में नर ही तो डूबते है
यादों की शहनाई में रब ही तो जुड़ते है
रब की दुआ भी ज़िंदगी को दोहराती है
तन मन की चाहत मुझे ही तो भड़काती है

दूर-दूर ये कदम मेरी निशानी देती है
जिंदगी की पथ मुझे निभानी देती है
मन की चाहत कभी जुड़ती नही
तन की राहत कभी मिलती नही

रचयिता:रामअवध

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